लेंस मायोपिया और हाइपरोपिया कैसे ठीक करते हैं
पावर वाले लेंस आँख में जाने से पहले रोशनी को मोड़ते हैं, इस प्रक्रिया को रिफ्रैक्शन कहते हैं। लेंस का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि नज़र की दिक्कत किस तरह की है।
मायोपिया (पास की नज़र साफ) में इमेज रेटिना के आगे बनती है। कॉनकेव (माइनस) लेंस रोशनी की किरणों को बाहर की ओर फैलाते हैं ताकि फोकस पीछे खिसककर रेटिना पर आ जाए। 
हाइपरोपिया (दूर की नज़र साफ) में रोशनी रेटिना के पीछे फोकस होती है। कॉन्वेक्स (प्लस) लेंस रोशनी को अंदर की ओर मोड़कर फोकल पॉइंट को आगे रेटिना पर लाते हैं। 
दोनों ही हालात में चश्मा आँख के ऑप्टिकल असंतुलन की भरपाई करता है ताकि इमेज ठीक वहीं बने जहाँ बननी चाहिए। 
प्रेस्क्रिप्शन क्यों ज़रूरी है
हर पावर वाले लेंस की जोड़ी आँखों की जाँच में मापे गए खास नंबर से बनाई जाती है। यह नंबर बताता है कि नज़र ठीक करने के लिए कितनी पावर चाहिए, जो आम तौर पर डायोप्टर में लिखी जाती है।
इसमें कई हिस्से हो सकते हैं, जैसे मायोपिया या हाइपरोपिया का करेक्शन, एस्टिग्मेटिज़्म के लिए सिलिंड्रिकल करेक्शन, और कभी-कभी प्यूपिलरी डिस्टेंस (PD), जो लेंस और आँखों की सही सीध तय करता है।
इन मापों में छोटा फर्क भी साफ दिखने और आराम पर असर डालता है। इसीलिए पावर वाले लेंस हमेशा हर व्यक्ति के लिए अलग से बनाए जाते हैं।
निष्कर्ष
पावर वाले लेंस इस तरह काम करते हैं कि वे आँख में आने वाली रोशनी को बदल देते हैं ताकि वह रेटिना पर सही जगह फोकस हो। नज़र की दिक्कत के हिसाब से — मायोपिया, हाइपरोपिया, एस्टिग्मेटिज़्म या प्रेसबायोपिया — लेंस का शेप और पावर तय किया जाता है।
नंबर की सटीकता, लेंस की सामग्री और कोटिंग भी आराम और नज़र की क्वालिटी में बड़ी भूमिका निभाते हैं। सही तरह से फिट लेंस के साथ चश्मा रोज़ साफ देखने का आसान और असरदार ज़रिया बन जाता है।






